14/05/2026
रिपोर्ट : वरुण वैध
धनबाद : गुरुवार को शिल्पे अनन्या बांग्ला त्रैमासिक पत्रिका के कार्यालय धनबाद में डॉ. काशी नाथ चटर्जी द्वारा लिखित आत्म कथात्मक पुस्तक "अपने हिस्से की ज़िंदगी" का विमोचन प्रो. डॉ. दीपक कुमार सेन की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में साहित्य, शिक्षा, विज्ञान आंदोलन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक लोगों की गरिमामयी उपस्थिति रही।इस अवसर पर डॉ. काशीनाथ चटर्जी ने अपनी पुस्तक के संबंध में कहा कि वे पिछले लगभग दस वर्षों से ज्ञान-विज्ञान आंदोलन, शिक्षा आंदोलन और सामाजिक अनुभवों पर लगातार लिखते रहे हैं। प्रख्यात लेखक स्वर्गीय अजीत राय के उत्साह और प्रेरणा से उन लेखों को पुस्तक का स्वरूप दिया गया। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक का प्रारंभिक रूप “चिह्न दखल एर लड़ाई” नाम से बांग्ला में प्रकाशित हुआ था, जिसकी चर्चा बंगाल तथा बांग्ला साहित्यिक जगत में व्यापक रूप से हुई थी। अब वही पुस्तक हिंदी में "अपने हिस्से की ज़िंदगी" के रूप में प्रकाशित हुई है।डॉ. चटर्जी ने कहा कि इस पुस्तक को लिखने का उनका मुख्य उद्देश्य देशभर में ज्ञान-विज्ञान आंदोलन, साक्षरता अभियान और शिक्षा आंदोलन के दौरान प्राप्त अनुभवों को साझा करना है। उन्होंने कहा कि उन्हें भारत के लगभग सभी राज्यों में भ्रमण करने तथा विभिन्न भाषा-भाषी और विविध समुदायों के लोगों के बीच काम करने का अवसर मिला। इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि भारत की वास्तविक शक्ति “अनेकता में एकता” की भावना में निहित है।उन्होंने यह भी कहा कि भारत ज्ञान विज्ञान समिति तथा उससे जुड़े हजारों कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम से साक्षरता और विज्ञान आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाया। उन समर्पित कार्यकर्ताओं के संघर्ष, प्रतिबद्धता और योगदान को भी उन्होंने इस पुस्तक में स्थान देने का प्रयास किया है।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. डॉ. दीपक कुमार सेन ने सभी उपस्थित लोगों का स्वागत किया और कहा कि उन्हें अत्यंत प्रसन्नता है कि डॉ. काशी नाथ चटर्जी ने अपने जीवन के अनुभवों और आंदोलनकारी संघर्षों को पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि वे इस पुस्तक को बांग्ला में पढ़ चुके हैं और यह विज्ञान आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगी। उन्होंने लेखक को हार्दिक बधाई भी दी।भारत ज्ञान विज्ञान समिति की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रवि सिंह ने कहा कि इस पुस्तक को पढ़कर उन्हें नई ऊर्जा मिली। साथ ही यह समझने का अवसर भी मिला कि विज्ञान आंदोलन में हजारों कार्यकर्ताओं ने किस प्रकार अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक से यह स्पष्ट होता है कि विज्ञान आंदोलन ने पूरे देश में किस तरह अपनी मजबूत पकड़ बनाई और ग्रामीण युवाओं को संगठित तथा जागरूक किया।
ज्ञान विज्ञान समिति, झारखंड के उपाध्यक्ष हेमंत जायसवाल ने कहा कि वे स्वयं इस आंदोलन के हमसफर रहे हैं और उन्हें अत्यंत खुशी है कि डॉ. काशी नाथ चटर्जी ने अपने आंदोलनकारी जीवन को आत्मकथात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि पिछले लगभग 30 वर्षों से वे साथ-साथ काम करते आ रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं जनआंदोलन के नेता विकास ठाकुर ने लेखक को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने भी साक्षरता और विज्ञान आंदोलन को बहुत निकट से देखा है। यह पुस्तक निश्चित रूप से कार्यकर्ताओं को नई ऊर्जा प्रदान करेगी।अधिवक्ता सौरभ चटर्जी ने कहा बचपन से हमने पिताजी के काम को नजदीक से देखा है उनका पूरा जीवन समाज को समर्पित रहा है आज भी वे सक्रिय हैं।
ज्ञान विज्ञान समिति के जिला सचिव भोला नाथ राम ने कहा कि वे 14 वर्ष की आयु से ही साक्षरता आंदोलन से जुड़े रहे हैं। उन्होंने हजारों स्वयंसेवकों को निस्वार्थ भाव से काम करते देखा है। यह पुस्तक आने वाली पीढ़ी के स्वयंसेवक साथियों के लिए प्रेरणादायी दस्तावेज का कार्य करेगी।कार्यक्रम में विश्वजीत गुप्ता, कवि जगबंधु आचार्जी,रानी मिश्रा बैसाखी चंद्र तथा पार्थ सेनगुप्ता सहित अन्य उपस्थित लोगों ने भी अपने विचार व्यक्त किए।